एक समय की बात है

 एक समय की बात है भगवान गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ बैठे हुए थे और उन्हें उपदेश दे रहे थे। तब उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, “क्रोध इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन है। क्रोध करने वाला व्यक्ति खुद को हानि पहुंचाता ही है लेकिन दूसरों को भी हानि पहुंचाता है। वह प्रतिशोध की आग में जलता है और अपने जीवन को बर्बाद करता है।”
उनके उपदेश खत्म हो जाने के बाद उनके शिष्यों में से एक शिष्य खड़ा होता है और उसे बोलता है, “तू एक ढोंगी है! तेरी बातें मनुष्यों के रहन-सहन से विपरीत है। तू जो भी कहता है उसे अपने जीवन में अनुसरण नहीं करता और दूसरों को यह सब करने कहता है।”
जब उसका वह शिष्य गौतम बुद्ध को उल्टी-सीधी बातें कह रहा था तब गौतम बुद्ध ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और वे शांत बैठे थे। लेकिन ऐसे में वह व्यक्ति और भी ज्यादा गुस्सा हो गया और गुस्से में आकर उसने गौतम बुद्ध के मुंह पर थूक दिया। इसके बाद भी महात्मा गौतम बुद्ध को गुस्सा नहीं आया और वे शान्त थे। उन्होंने अपने चेहरे से थूक को पोछा और वह चुपचाप बैठ गए।
यह सब देखकर उस शिष्य को समझ नहीं आया कि वह क्या करेगा। गुस्से में आकर वह उस जगह को छोड़कर चला गया और अगले दिन अपने घर पहुंचा। जैसे ही वह अपने घर पहुंचा तब तक उसका दिमाग शांत हो चुका था। दिमाग के सांत होते ही उसे इस बात का एहसास हुआ कि उसने कितनी बड़ी गलती की है। उसे पाप हुआ है।  वह खुद को मन ही मन कहने लगा, “यह मैंने क्या कर दिया। मैंने महात्मा बुद्ध का अपमान किया है। ऐसा पाप मैं कैसे कर सकता हूं। मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी। मुझे जाकर उनसे माफ़ी मांगनी होगी।”
यह कहकर वह तुरंत हि गौतम बुद्ध के पास चला गया लेकिन गौतम बुद्ध उस स्थान पर नहीं थे। ऐसे में वह शिष्य जगह-जगह भटककर उन्हें खोजने लगा। जैसे ही उसे महात्मा बुद्ध मिले तो वह उनके पैरों पर गिर गया और उनसे कहने लगा, “मुझे माफ कर दीजिए। मुझसे गलती हुई है। मैंने आपका अपमान किया है। मैंने यह बहुत बड़ा पाप किया है।”
यह सब देखकर गौतम बुद्ध ने उससे कहा, “शांत हो जाओ, क्या बात है मुझे बताओ? तुम कौन हो?”
गौतम बुद्ध के यह पूछने पर वह शिष्य चौक गया। वह सोचने लगा की महात्मा बुद्ध मुझे कैसे भुल सकते है। मैने तो उनका अपमान किया था।
यह सोचकर उसने महात्मा बुद्ध से पूछा, “मैं वही शिष्य हूं जिससे कल आपका अपमान किया था और आप इतनी जल्दी मुझे भूल गए।”
“हमें कल की बातों को कल में हि छोड़ देना चाहिए। वह अच्छा हो या बुरा उसके बारे में बार-बार विचार नहीं करना चाहिए। मैं बीती हुई बातों को पीछे छोड़कर आगे चलता हूं और ऐसा ही हम सब को भी करना चाहिए।” महात्मा बुद्ध ने उस शिष्य से कहा।
महात्मा बुद्ध की यह बातें सुनकर वह शिष्य और भी ज्यादा प्रभावित हुआ और उनसे बोला मैं आज से आपकी हर बातों को माना करूंगा।
Moral of the story – इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि क्रोध करना इंसान के लिए सबसे खतरनाक है। यह मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है जो उसे बर्बाद कर सकता है। इसलिए मनुष्य को कभी भी क्रोध नहीं करना चाहिए।
इस कहानी से हमें यह भी सीख मिलती है कि बीती हुई बातों को हमें भूलकर आगे बढ़ना चाहिए। अगर कोई मनुष्य अपनी बीती हुई बातों पर ज्यादा ध्यान देता है तो उसका ध्यान पूरी तरह से भूतकाल में लगा होता है और वह इंसान कभी भी आगे बढ़ने की और विचार नहीं कर पाता। इसीलिए हमेशा पुरानी बातों को छोड़कर आगे बढ़ने की सोचे।
एक समय की बात है भगवान गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ बैठे हुए थे और उन्हें उपदेश दे रहे थे। तब उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, “क्रोध इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन है। क्रोध करने वाला व्यक्ति खुद को हानि पहुंचाता ही है लेकिन दूसरों को भी हानि पहुंचाता है। वह प्रतिशोध की आग में जलता है और अपने जीवन को बर्बाद करता है।”उनके उपदेश खत्म हो जाने के बाद उनके शिष्यों में से एक शिष्य खड़ा होता है और उसे बोलता है, “तू एक ढोंगी है! तेरी बातें मनुष्यों के रहन-सहन से विपरीत है। तू जो भी कहता है उसे अपने जीवन में अनुसरण नहीं करता और दूसरों को यह सब करने कहता है।”जब उसका वह शिष्य गौतम बुद्ध को उल्टी-सीधी बातें कह रहा था तब गौतम बुद्ध ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और वे शांत बैठे थे। लेकिन ऐसे में वह व्यक्ति और भी ज्यादा गुस्सा हो गया और गुस्से में आकर उसने गौतम बुद्ध के मुंह पर थूक दिया। इसके बाद भी महात्मा गौतम बुद्ध को गुस्सा नहीं आया और वे शान्त थे। उन्होंने अपने चेहरे से थूक को पोछा और वह चुपचाप बैठ गए।यह सब देखकर उस शिष्य को समझ नहीं आया कि वह क्या करेगा। गुस्से में आकर वह उस जगह को छोड़कर चला गया और अगले दिन अपने घर पहुंचा। जैसे ही वह अपने घर पहुंचा तब तक उसका दिमाग शांत हो चुका था। दिमाग के सांत होते ही उसे इस बात का एहसास हुआ कि उसने कितनी बड़ी गलती की है। उसे पाप हुआ है।  वह खुद को मन ही मन कहने लगा, “यह मैंने क्या कर दिया। मैंने महात्मा बुद्ध का अपमान किया है। ऐसा पाप मैं कैसे कर सकता हूं। मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी। मुझे जाकर उनसे माफ़ी मांगनी होगी।”यह कहकर वह तुरंत हि गौतम बुद्ध के पास चला गया लेकिन गौतम बुद्ध उस स्थान पर नहीं थे। ऐसे में वह शिष्य जगह-जगह भटककर उन्हें खोजने लगा। जैसे ही उसे महात्मा बुद्ध मिले तो वह उनके पैरों पर गिर गया और उनसे कहने लगा, “मुझे माफ कर दीजिए। मुझसे गलती हुई है। मैंने आपका अपमान किया है। मैंने यह बहुत बड़ा पाप किया है।”यह सब देखकर गौतम बुद्ध ने उससे कहा, “शांत हो जाओ, क्या बात है मुझे बताओ? तुम कौन हो?”गौतम बुद्ध के यह पूछने पर वह शिष्य चौक गया। वह सोचने लगा की महात्मा बुद्ध मुझे कैसे भुल सकते है। मैने तो उनका अपमान किया था।यह सोचकर उसने महात्मा बुद्ध से पूछा, “मैं वही शिष्य हूं जिससे कल आपका अपमान किया था और आप इतनी जल्दी मुझे भूल गए।”“हमें कल की बातों को कल में हि छोड़ देना चाहिए। वह अच्छा हो या बुरा उसके बारे में बार-बार विचार नहीं करना चाहिए। मैं बीती हुई बातों को पीछे छोड़कर आगे चलता हूं और ऐसा ही हम सब को भी करना चाहिए।” महात्मा बुद्ध ने उस शिष्य से कहा।महात्मा बुद्ध की यह बातें सुनकर वह शिष्य और भी ज्यादा प्रभावित हुआ और उनसे बोला मैं आज से आपकी हर बातों को माना करूंगा।Moral of the tale – इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि क्रोध करना इंसान के लिए सबसे खतरनाक है। यह मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है जो उसे बर्बाद कर सकता है। इसलिए मनुष्य को कभी भी क्रोध नहीं करना चाहिए।इस कहानी से हमें यह भी सीख मिलती है कि बीती हुई बातों को हमें भूलकर आगे बढ़ना चाहिए। अगर कोई मनुष्य अपनी बीती हुई बातों पर ज्यादा ध्यान देता है तो उसका ध्यान पूरी तरह से भूतकाल में लगा होता है और वह इंसान कभी भी आगे बढ़ने की और विचार नहीं कर पाता। इसीलिए हमेशा पुरानी बातों को छोड़कर आगे बढ़ने की सोचे।

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